Window number 9

It was unfortunate to hear from the officer, ‘well, then take them in 15 days’. The initial question was : Sir, when should i come to collect my certificates? He uttered, come after 25 days. 25 days, I exclaimed! That’s too long, can you plz make it in 7 days, it’s extremely urgent. A potential pause was there, he took a long breathe eyes closed, feels like he got a feeling an internal annoy. He controls himself and responds politely: show me your letter of urgency and I will attach it with your application. He added, everybody claims urgent, everybody is in hurry to go abroad. I mourned. He proceeds, “Well, take them in 15 days”. Ok sir, I left the window.

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Think once before you utter the word “Bhaiya”

You dont have right to call me bhaiya. Please mind your language when you speak next time” was the spontaneous response when he was trying to submit his application to window no. 2.

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विपस्सना की पहली अनुभूति

सन २०१० के जुलाई महीने में मैं सम्मर वेकेशन मनाने काठमांडू गया। वर्ल्ड कप का नशा हर व्यक्ति में छाया हुआ था। फाइनल देखने के लिए दोस्त के रूम पर बियर के बोतल खुली और वर्ल्ड कप ख़तम होने के बाद घर लौटने की तैयारी करी|

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कृपया गलत का समर्थन ना करे।

कुछ लोग राजनितिक पार्टिया के समर्थन / प्रशंसा ऐसे करते है  मानो की ओ अपने मामा के घर के सोने की हाथी हो। चाहे ओ कांग्रेस हो या कॉम्युनिस्ट। यह लोग एक दूसरे की खिचाई करने में कोई भी कसर नहीं छोड़ते। मेरे भेजे में एक बात नहीं घुश पाती है की यह लोग किसी भी पार्टी के लिए मरने मिटने के लिए क्यों तैयार होजाते है।

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नव वर्ष २०७३ एक सिख

भगवान – (भुमि, गगन, वायु, अाग, निर)
इन पाच तत्व से बना है भगवान, इनही तत्व से बना है मनुष्य ।
हम ताे निकले थे भगवान के खाेजी मे, यह ताे है हमारे अन्दर ।
पुजते है हम ब्रम्हा, विष्णु, महेश काे, देख पाया इन्हे कभी नही ।
कहते है इन्हाेने बनाया हमें, आया मैं माँ के कोख से।
उन्होंने कहा वो बसते है मंदिरों में, हम यही मानते चले आये।
जब है भगवान अपने अंदर, भटक रही है ये संसार क्यों?

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